

✍️ संजय तिवारी
मधेश क्षेत्र के गाँव–गाँव में कबो आम देखे जाए वाला “घोनसारी” आज धीरे–धीरे गायब होत जा रहल बा। घोनसारी, जहाँ धान, मक्का आ गहुँ से भुजा (मुरही), चिउरा आ सत्तु बनावल जाला, ओह पारंपरिक उद्योग पर आधुनिक मशीन आ बदलत जीवनशैली के गहिर असर पड़ल बा।
पहिले हर गाँव में एक–दू गो घोनसारी जरूर रहत रहे, जहाँ स्थानीय लोग आपन अन्न ले जा के भुजा बनवावत रहे। घोनसारी ना सिर्फ खाद्य सामग्री तैयार करे के जगह रहे, बलुक ई गाँव के लोगन के मिलल–जुलल के केन्द्र भी रहे। लोग इहाँ जुट के आपसी हाल–चाल पूछत रहे आ सामाजिक सम्बन्ध मजबूत करत रहे।
पर अब समय बदल गइल बा। बाजार में रेडीमेड भुजा आ चिउरा आसानी से उपलब्ध होखे लागल बा, आ मशीन से चलत मिल के कारण परंपरागत घोनसारी के महत्व घटत जा रहल बा। युवा पीढ़ी भी एह पेशा में कम रुचि देखावत बिया, जेसे ई पुरान सीप (कौशल) लुप्त होखे के कगार पर पहुँच गइल बा।
स्थानीय बासिन्दा लोग बतावत बा कि घोनसारी सिर्फ रोजी–रोटी के साधन ना रहे, बलुक ई मधेश के संस्कृति आ पहचान के हिस्सा रहे। अगर एह दिशा में संरक्षण ना कइल गइल, त आने वाला समय में घोनसारी केवल इतिहास बन के रह जाई।
जानकार लोग के मानना बा कि सरकार आ स्थानीय तह अगर ई परंपरागत उद्योग के संरक्षण आ प्रवर्द्धन पर ध्यान दे, त ना सिर्फ रोजगार बढ़ी, बलुक मधेश के सांस्कृतिक धरोहर भी बचल रही।
मधेशमे “घोनसारी” के एगो खास स्थान रहल बा। ई सिर्फ भुजा (मुरही), चिउरा आ सत्तु बनावे के जगह ना ह, बलुक गाँव के सामाजिक संरचना, आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था आ परंपरा के मजबूत आधार भी रहल बा। बाकिर बदलत समय, आधुनिकता आ बजार के प्रभाव के चलते आज घोनसारी के अस्तित्व पर सवाल उठ रहल बा।
🌑 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि आ महत्व
घोनसारी के इतिहास बहुत पुरान बा। जब आधुनिक मिल आ फैक्ट्री के विकास ना भइल रहे, तब गाँव के लोग आपन अन्न—जइसे धान, मक्का आ गहुँ—घोनसारी में ले जा के भुजा, चिउरा आ सत्तु बनवावत रहे। ई प्रक्रिया पूरी तरह स्थानीय साधन आ श्रम पर आधारित रहे, जे ग्रामीण आत्मनिर्भरता के मजबूत उदाहरण मानल जाला।
घोनसारी के एकर सांस्कृतिक महत्व भी कम ना रहे। विवाह, पूजा, तिहार आ अन्य सामाजिक कार्यक्रम में भुजा के विशेष स्थान बा। एह हिसाब से घोनसारी मधेश के परंपरा आ जीवनशैली के अभिन्न हिस्सा रहल बा।
🌑 सामाजिक भूमिका: सिर्फ उद्योग ना, मेल–मिलाप के केन्द्र
घोनसारी के सबसे खास बात ई रहे कि ई केवल उत्पादन केन्द्र ना, बल्कि सामाजिक मेल–मिलाप के स्थान भी रहे। गाँव के लोग जब अन्न लेके घोनसारी पहुँचत रहे, त ओहिजा बातचीत, आपसी सहयोग आ सम्बन्ध के मजबूती बढ़त रहे।
एह तरह घोनसारी ग्रामीण समाज में एकता आ सामुदायिक भावना के बढ़ावा देवे में महत्वपूर्ण भूमिका निभावत रहे।
🌑 आर्थिक पक्ष: साना उद्योग, बड़ योगदान
घोनसारी साना स्तर के उद्योग होते हुए भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देत रहल बा।
स्थानीय स्तर पर रोजगार के सृजन, किसान के उत्पाद के मूल्यवर्धन, सस्ता आ ताजा खाद्य सामग्री के उपलब्धता। ई सब कारण से घोनसारी मधेश के आर्थिक संरचना के आधार मानल जा सकत बा।
🌑 आधुनिकता के प्रभाव: घटत चलन
पिछला कुछ साल में घोनसारी पर आधुनिकता के गहिर असर पड़ल बा।
मशीन से चलत राइस मिल आ राइस उद्योग के विकास, बजार में पैक कइल भुजा आ चिउरा के सहज उपलब्धता, युवा पीढ़ी के पारंपरिक पेशा से दूरी, एह सब कारण से घोनसारी के संख्या तेजी से घट रहल बा। आज कई गाँव में ई परंपरा लगभग समाप्त हो चुकल बा।
🌑 चुनौती आ संकट
घोनसारी के सामने कई गो चुनौती खड़ा बा:
आर्थिक असुरक्षा – आमदनी कम होखे के कारण लोग ई पेशा छोड़ रहल बा, तकनीकी पिछड़ापन – आधुनिक मशीन से मुकाबला मुश्किल बा, सरकारी उपेक्षा – संरक्षण आ प्रोत्साहन के कमी, सांस्कृतिक बेपरवाही – नई पीढ़ी में जागरूकता के अभाव, अगर समय रहते ध्यान ना दिहल गइल, त ई परंपरा पूरी तरह लुप्त हो सकेला।
🌑 संरक्षण के उपाय: का हो सकेला?
घोनसारी के बचावे खातिर कुछ ठोस कदम जरूरी बा:
स्थानीय तह द्वारा अनुदान आ प्रोत्साहन कार्यक्रम, आधुनिक प्रविधि से जोड़ के सुधार (हाइब्रिड मॉडल), सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षण, युवा पीढ़ी के प्रशिक्षण आ जागरूकता
एह उपाय से घोनसारी के आधुनिक रूप में पुनर्जीवित कइल जा सकेला।
🌑 निष्कर्ष
घोनसारी मधेश के सिर्फ एगो पुरान उद्योग ना, बल्कि सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता आ आर्थिक आत्मनिर्भरता के प्रतीक ह। आज जब ई परंपरा संकट में बा, तब जरूरी बा कि समाज, सरकार आ युवा मिलके एह के बचावे के प्रयास करे। ना त, आने वाला पीढ़ी घोनसारी के केवल किताब आ कहानी में पढ़ी, देख ना पाई।



